Bokaro: जिले में किए गए थाना प्रभारियों के तबादले में एक ऐसा नाम शामिल है जिसने पुलिस प्रशासन के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है. यह मामला न सिर्फ अधिकारियों के बीच कानून और प्रोटोकॉल के उल्लंघन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि एक गंभीर सीआईडी (अपराध अनुसंधान विभाग) जांच के दायरे में आने वाले अधिकारी को महत्वपूर्ण पद पर तैनात करने से भी जुड़ा है.
सीआईडी जांच वाले दरोगा को मिली थानेदारी
तबादला सूची के अनुसार, दरोगा शैलेन्द्र पासवान को बीएस सिटी थाना से हटाकर बरमसिया ओपी का थानेदार (थाना प्रभारी) बनाया गया है. यह वह अधिकारी हैं जिनके खिलाफ सीआईडी मुख्यालय की तरफ से एक गंभीर मामले में जांच का आदेश दिया गया है और वह अभी भी जांच के घेरे में हैं. सीआईडी के कुछ सुत्रों ने बताया है कि जांच की दिशा शैलेंद्र पासवान के विरोध में ही जा रहा है. हालांकि अभी जांच जारी है.
आईजी अनुमोदन की अनदेखी का आरोप
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू यह है कि बोकारो एसपी ने इंस्पेक्टर स्तर के जिन अधिकारियों की पोस्टिंग की है, वह कथित तौर पर आईजी के अनुमोदन के बिना की गई है. इनमें खुर्शीद आलम और अनिल कच्छप शामिल हैं. खुर्शीद आलम को साइबर थाना से हटाकर हरला थाना और अनिल कच्छप को हरला थाना से हटाकर साइबर थाना का प्रभारी बनाया गया है. पुलिस नियमानुसार, इस स्तर के तबादलों में जोनल आईजी या रेंज के डीआईजी का अनुमोदन आवश्यक होता है. बिना आईजी के अनुमोदन के ऐसा करना कानून एवं प्रोटोकॉल का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है.
CID मुख्यालय ने जारी किया था जांच का आदेश
दरोगा शैलेन्द्र पासवान के खिलाफ चल रही सीआईडी जांच का खुलासा एक आधिकारिक पत्र से होता है, जिसे 23 जुलाई को सीआईडी मुख्यालय की तरफ से सीआईडी प्रभारी को लिखा गया था. पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सीआईडी मुख्यालय को एक आवेदन प्राप्त हुआ है, जिसमें बीएस सिटी थाना कांड सं0-92/2024 के अनुसंधानकर्ता (आईओ) शैलेन्द्र पासवान और पर्यवेक्षण पदाधिकारी पुलिस डीएसपी सदर आलोक रंजन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. जांचकर्ताओं पर यह आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग किया और सभी संबंधित साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद, अभियुक्त को बचाने के उद्देश्य से काम किया. जांच रिपोर्ट समर्पित करने के आदेश के दौरान धारा 495 भादवि (पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना) को जानबूझ कर और बिना किसी आधार के हटा दिया. सीआईडी मुख्यालय ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश दिया था कि आवेदन पत्र में वर्णित तथ्यों के आलोक में जांच करते हुए जांच प्रतिवेदन एक सप्ताह के अंदर इस कार्यालय में भेजने का कष्ट किया जाय, ताकि अग्रत्तर कार्रवाई की जा सके.
गंभीर आरोपों के तहत सीआईडी जांच का सामना कर रहे अधिकारी को थानेदार जैसा महत्वपूर्ण पद दिया जाना, और वरिष्ठ अधिकारियों के अनुमोदन को दरकिनार किया जाना, बोकारो पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है.
